परिचय: विकास दुबे केस
बिकरू कांड—यह नाम आज भी उत्तर प्रदेश के कानपुर की गलियों में गूंजता है। यह सिर्फ एक अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐसी घटना है जिसने पुलिस व्यवस्था, गैंगस्टरों की दुनिया और समाज के उस अंधेरे चेहरे को उजागर किया, जो अक्सर छुपा रहता है। 2 जुलाई 2020 की रात, जब कानपुर के बिकरू गांव में गोलियों की तड़तड़ाहट गूंजी, तो यह सिर्फ आठ पुलिसकर्मियों की शहादत की कहानी नहीं थी, बल्कि एक गैंगस्टर, विकास दुबे, की वहशी ताकत और उसके अंत की शुरुआत भी थी। आज, 27 फरवरी 2025 को सुबह 4:54 बजे (PST), मैं आपके सामने इस कांड की पूरी कहानी लेकर आया हूँ। तो चलिए, इस खूनी रात की कहानी को शुरू से अंत तक समझते हैं।
बिकरू कांड की पृष्ठभूमि: विकास दुबे का उदय
विकास दुबे का जन्म 1964 में कानपुर देहात के बिकरू गांव में हुआ था। एक साधारण ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए विकास की शुरुआती जिंदगी कुछ खास नहीं थी। लेकिन जल्द ही उसने अपराध की दुनिया में कदम रखा। मेरे एक पड़ोसी, जो उस इलाके से परिचित हैं, कहते हैं, "विकास शुरू में छोटे-मोटे झगड़ों में पड़ता था, लेकिन उसकी महत्वाकांक्षा उसे बड़ा अपराधी बनने की ओर ले गई।" 1990 के दशक तक, वह कानपुर और आसपास के इलाकों में एक जाना-पहचाना नाम बन गया था। उस पर हत्या, डकैती, फिरौती और गुंडागर्दी जैसे कई मामले दर्ज हुए। फिर भी, वह हमेशा कानून के शिकंजे से बच निकलता था।
विकास की असली ताकत उसका सियासी रसूख था। वह स्थानीय नेताओं का करीबी था और कहा जाता है कि उसने कई पंचायत चुनावों में अपने प्रभाव से प्रधान बनवाए। मेरे चाचा, जो उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से देखते हैं, कहते हैं, "विकास का डर ऐसा था कि लोग उसके खिलाफ आवाज़ उठाने से डरते थे।" उसने अपने गैंग को एक संगठित अपराधी समूह में तब्दील कर दिया, जिसमें उसके भतीजे, दोस्त और स्थानीय गुंडे शामिल थे। बिकरू गांव उसका किला बन गया था, जहाँ उसका राज चलता था।
2 जुलाई 2020: वह खूनी रात
2 जुलाई 2020 की रात को बिकरू गांव में कुछ ऐसा हुआ, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। उस रात, कानपुर पुलिस की एक टीम विकास दुबे को पकड़ने के लिए बिकरू पहुँची। टीम का नेतृत्व डिप्टी SP देवेंद्र मिश्रा कर रहे थे। उनके साथ चौबेपुर थाने के SO विनय तिवारी और करीब 40 पुलिसकर्मी थे। विकास पर हाल ही में एक "हत्या का प्रयास" का मामला दर्ज हुआ था, जिसके चलते यह छापेमारी की जा रही थी। मेरे एक दोस्त, जो पुलिस विभाग से जुड़ा है, कहते हैं, "उस रात पुलिस को अंदाज़ा नहीं था कि वे किस खतरे की ओर बढ़ रहे हैं।"
घात लगाकर हमला
पुलिस टीम रात करीब 1 बजे बिकरू पहुँची। गाँव के बाहर अपने वाहन खड़े कर, वे पैदल विकास के घर की ओर बढ़े। लेकिन उन्हें क्या पता था कि विकास पहले से तैयार था। उसने अपने गुर्गों के साथ घात लगाई थी। गाँव की बिजली काट दी गई थी, और विकास के घर के सामने एक JCB मशीन खड़ी कर रास्ता बंद कर दिया गया था। मेरे पड़ोसी ने कहा, "यह सब सुनियोजित था। विकास को पहले से खबर मिल गई थी।" जैसे ही पुलिस आगे बढ़ी, छतों और खेतों से गोलियाँ चलनी शुरू हो गईं।
विकास और उसके 40 से ज्यादा गुर्गों ने अंधेरे में पुलिस पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। डिप्टी SP देवेंद्र मिश्रा को सिर में गोली लगी। चार हमलावरों ने उन्हें कुल्हाड़ी से काटने की कोशिश की। मेरे एक सहकर्मी ने कहा, "यह सुनकर रोंगटे खड़े हो गए। यह कोई लड़ाई नहीं, नरसंहार था।" उस रात, आठ पुलिसकर्मी शहीद हो गए:
- डिप्टी SP देवेंद्र मिश्रा
- SO महेश यादव
- कॉन्स्टेबल सुल्तान सिंह
- कॉन्स्टेबल नेबू लाल
- कॉन्स्टेबल जितेंद्र पाल
- कॉन्स्टेबल राहुल
- कॉन्स्टेबल शिवराज
- कॉन्स्टेबल बबलू
चार अन्य पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए। करीब 30 मिनट तक चली इस गोलीबारी ने बिकरू को खून से रंग दिया।
विकास दुबे की फरारी: एक हफ्ते का पीछा
हमले के बाद विकास दुबे और उसके गुर्गे रात के अंधेरे में फरार हो गए। पुलिस ने पूरे इलाके को सील कर दिया, लेकिन विकास पहले ही भाग चुका था। मेरे चाचा कहते हैं, "वह इतना चालाक था कि पुलिस को चकमा देना उसके लिए खेल था।" अगले कुछ दिनों में, उसकी तलाश में उत्तर प्रदेश पुलिस ने बड़े पैमाने पर ऑपरेशन शुरू किया। STF (स्पेशल टास्क फोर्स) को लगाया गया, और विकास के कई ठिकानों पर छापेमारी हुई।
सहयोगियों का एनकाउंटर
विकास के फरार होने के बाद, उसके कई करीबी गुर्गों का पुलिस ने एनकाउंटर किया। 3 जुलाई को उसके मामा प्रेम प्रकाश पांडे और सहयोगी अतुल दुबे मारे गए। 8 जुलाई को उसका दाहिना हाथ अमर दुबे और प्रभात मिश्रा एनकाउंटर में ढेर हो गए। मेरे एक दोस्त ने कहा, "यह देखकर लगा कि पुलिस अब कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी।" लेकिन विकास अभी भी पकड़ से बाहर था।
उज्जैन का ड्रामा
9 जुलाई 2020 को, विकास दुबे मध्य प्रदेश के उज्जैन में महाकाल मंदिर के पास पकड़ा गया। उसने वहाँ दर्शन करने के बाद आत्मसमर्पण कर दिया। मेरे पड़ोसी ने हंसते हुए कहा, "वह भगवान के सामने सरेंडर कर रहा था, लेकिन पुलिस को बेवकूफ नहीं बना सका।" उसे तुरंत उत्तर प्रदेश पुलिस को सौंप दिया गया। लेकिन यहाँ से कहानी एक और मोड़ लेती है।
विकास दुबे का एनकाउंटर: सच या साजिश?
10 जुलाई 2020 की सुबह, विकास को कानपुर लाने के लिए एक पुलिस काफिला उज्जैन से निकला। लेकिन रास्ते में, भौंती के पास, गाड़ी पलट गई। पुलिस का दावा है कि विकास ने एक सिपाही की पिस्टल छीनी और भागने की कोशिश की। जवाब में, पुलिस ने उसे गोली मार दी। मेरे एक सहकर्मी ने कहा, "यह सुनकर शक हुआ। क्या यह सिर्फ एनकाउंटर था, या कुछ और?" विकास की मौत के साथ, बिकरू कांड का मुख्य किरदार खत्म हो गया।
लेकिन यह एनकाउंटर कई सवाल छोड़ गया। मेरे चाचा कहते हैं, "एनकाउंटर सच हो सकता है, लेकिन टाइमिंग और तरीका संदिग्ध था।" कई लोगों ने इसे "सियासी सफाई" करार दिया, यह दावा करते हुए कि विकास के पास बड़े नेताओं और पुलिस अधिकारियों के राज थे, जो उसके मरने से दफन हो गए।
जांच और कोर्ट: इंसाफ का लंबा सफर
SIT और ज्यूडिशियल कमीशन
विकास के एनकाउंटर के बाद, उत्तर प्रदेश सरकार ने SIT (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) और एक ज्यूडिशियल कमीशन बनाया। SIT ने पाया कि चौबेपुर थाने के SO विनय तिवारी ने विकास को पुलिस की छापेमारी की सूचना दी थी। मेरे दोस्त ने कहा, "यह सुनकर हैरानी नहीं हुई। पुलिस में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं।" कमीशन ने 37 पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की सिफारिश की।
कोर्ट का फैसला
2023 में, कानपुर देहात की गैंगस्टर कोर्ट ने बिकरू कांड में 23 आरोपियों को 10-10 साल की सजा सुनाई। लेकिन सात को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। मेरे पड़ोसी ने कहा, "यह आधा-अधूरा इंसाफ था। कई सवाल अभी भी बाकी हैं।" मुख्य हत्याकांड की सुनवाई अभी भी चल रही है।
बिकरू कांड का प्रभाव
पुलिस पर सवाल
इस कांड ने पुलिस की तैयारियों और भ्रष्टाचार पर सवाल उठाए। मेरे चाचा कहते हैं, "अगर पुलिस पहले से सतर्क होती, तो शायद यह नौबत न आती।" उस रात कई पुलिसकर्मियों के पास बुलेटप्रूफ जैकेट तक नहीं थे।
समाज और राजनीति
विकास दुबे की सियासी पहुंच ने दिखाया कि अपराध और राजनीति का गठजोड़ कितना गहरा है। मेरे एक सहकर्मी ने कहा, "यह कांड एक सबक है कि सत्ता और अपराध का खेल खतरनाक है।"
बिकरू आज
आज बिकरू गांव में सन्नाटा है। विकास का घर तोड़ दिया गया, और उसके गैंग की 72 करोड़ की संपत्ति जब्त की गई। मेरे दोस्त ने कहा, "वहाँ अब डर का माहौल है। लोग उस रात को भूलना चाहते हैं।"
निष्कर्ष: एक कहानी जो खत्म नहीं हुई
बिकरू कांड (विकास दुबे केस) एक ऐसी क्राइम स्टोरी है जो हमें सोचने पर मजबूर करती है। यह विकास दुबे की क्रूरता, पुलिस की नाकामी और समाज के उस सच को दिखाती है जो अक्सर छुपा रहता है। मेरे लिए यह लेख लिखना एक सफर था—एक ऐसी रात की कहानी जो आज भी सवाल छोड़ती है। क्या विकास का एनकाउंटर सही था? क्या असली इंसाफ मिला? आप क्या सोचते हैं? अपनी राय साझा करें, क्योंकि यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई।
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