लेखक: सच्चाई की परतों से
परिचय: वो सर्द शाम जब खून की स्याही बही
4 दिसंबर 1973, दिल्ली की सर्दियों की एक ठंडी शाम। आसमान में हल्की धुंध थी, और सड़कों पर लोग अपने घरों की ओर लौट रहे थे। डिफेंस कॉलोनी—दिल्ली का एक पॉश इलाका, जहाँ अमीर और रसूखदार लोग रहा करते थे। उस शाम वहाँ कुछ ऐसा हुआ, जिसने न सिर्फ दिल्ली को, बल्कि पूरे देश को हक्का-बक्का कर दिया। विद्या जैन, एक 45 साल की महिला, अपने घर के बाहर बेरहमी से चाकुओं से गोद दी गईं। उनके शरीर पर 14 घाव थे—हर घाव एक कहानी कहता था, क्रूरता और विश्वासघात की।
ये कोई साधारण हत्या नहीं थी। इस हत्याकांड के पीछे था विद्या का अपना पति, डॉ. नरेंद्र सिंह जैन—एक मशहूर नेत्र सर्जन और तत्कालीन राष्ट्रपति वी.वी. गिरी का निजी डॉक्टर। डॉ. जैन ने अपनी प्रेमिका चंद्रेश शर्मा के साथ मिलकर विद्या की हत्या की सुपारी दी थी। दो किराए के हत्यारों—कर्तार सिंह और उजागर सिंह—ने इस साजिश को अंजाम दिया। "विद्या जैन हत्याकांड की पूरी कहानी" आज भी भारत में कॉन्ट्रैक्ट किलिंग के पहले हाई-प्रोफाइल मामलों में से एक मानी जाती है।
ये कहानी सिर्फ एक हत्या की नहीं है। ये प्यार, धोखे, लालच, और सत्ता की भूख की दास्ताँ है। इसने समाज को ये सवाल करने पर मजबूर किया कि क्या रिश्तों की नींव इतनी कमज़ोर हो सकती है? आइए, उस दौर में चलें, जब एक पति ने अपनी पत्नी को मिटाने के लिए खून की साजिश रची।
विद्या जैन: एक साधारण औरत की असाधारण कहानी
विद्या जैन का जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उनकी शादी डॉ. नरेंद्र सिंह जैन से हुई—एक ऐसे शख्स से, जिसने अपनी मेहनत और काबिलियत से ऊँचा मुकाम हासिल किया था। विद्या एक साधारण गृहिणी थीं। वो अपने पति के करियर को सपोर्ट करती थीं, उनका घर संभालती थीं। उनके दोस्त और पड़ोसी उन्हें एक शांत, सौम्य, और परिवार के प्रति समर्पित महिला के रूप में याद करते हैं।
डॉ. जैन उस समय दिल्ली के सबसे बड़े नेत्र सर्जनों में से एक थे। उनकी प्रतिष्ठा ऐसी थी कि लोग कहते थे, "वो अंधों को भी देखने की रोशनी दे सकते हैं।" 1970 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था, और वो राष्ट्रपति वी.वी. गिरी के निजी डॉक्टर बन गए थे। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक अंधेरा छिपा था। विद्या को शायद इसका अंदाज़ा नहीं था कि उनकी शादीशुदा ज़िंदगी में एक तूफ़ान आने वाला है।
1970 के दशक की शुरुआत में डॉ. जैन की मुलाक़ात चंद्रेश शर्मा से हुई। चंद्रेश उनकी सेक्रेटरी थीं—एक विधवा, जो अपनी खूबसूरती और चालाकी के लिए जानी जाती थी। जल्द ही दोनों के बीच नज़दीकियाँ बढ़ीं। विद्या को जब इस अफेयर का पता चला, तो उन्होंने इसका विरोध किया। उन्होंने डॉ. जैन से चंद्रेश को नौकरी से निकालने की माँग की। डॉ. जैन ने ऐसा किया, लेकिन उनका रिश्ता चंद्रेश से खत्म नहीं हुआ। वो उसे एक घर और पैसे देते रहे। ये वो बीज था, जिसने आगे चलकर विद्या की मौत की साजिश को जन्म दिया।
साजिश का जाल: प्यार और लालच की कहानी
डॉ. जैन और चंद्रेश का रिश्ता गहराता गया। चंद्रेश चाहती थीं कि वो डॉ. जैन से शादी करें और उनकी ज़िंदगी में विद्या की जगह लें। लेकिन इसके लिए एक बड़ी रुकावट थी—विद्या। तलाक लेना आसान नहीं था, खासकर उस दौर में, जब समाज और कानून दोनों इसे मुश्किल बनाते थे। फिर एक दिन, दोनों ने फैसला किया—विद्या को रास्ते से हटाना होगा।
ये साजिश आसान नहीं थी। डॉ. जैन एक सम्मानित शख्स थे। उनकी छवि साफ-सुथरी थी। अगर वो खुद कुछ करते, तो सबकी नज़र उन पर पड़ती। इसलिए उन्होंने किराए के हत्यारों का रास्ता चुना। चंद्रेश ने अपने पुराने संपर्कों का इस्तेमाल किया। उसकी मुलाक़ात राकेश कौशिक से हुई—एक 25 साल का एजुकेशन हवलदार, जो पैसों के लिए कुछ भी करने को तैयार था।
सितंबर 1973 में पहली कोशिश हुई। राकेश ने करण सिंह नाम के एक शख्स को 20,000 रुपये में विद्या की हत्या की सुपारी दी। चंद्रेश ने उसे 10,000 रुपये एडवांस में दिए। उसी दिन डॉ. जैन ने अपने इंडियन ओवरसीज़ बैंक के खाते से 10,000 रुपये निकाले—100-100 के नोटों में। लेकिन करण सिंह ने पैसा लेकर धोखा दिया। उसने हत्या नहीं की और पैसे से एक ट्रक खरीद लिया। पहली साजिश नाकाम हो गई।
नवंबर 1973 में दूसरी कोशिश शुरू हुई। राकेश अपने गाँव चरखी दादरी (हरियाणा) गया और राम किशन नाम के एक 20 साल के मैकेनिक को दिल्ली ले आया। उसे कहा गया कि वो ट्रक के लिए इंजन के छल्ले खरीदने में मदद करेगा। लेकिन असल मकसद कुछ और था। चंद्रेश ने एक टैक्सी ड्राइवर, रामजी, को भी शामिल किया। उसे एक कार और नौकरी का लालच दिया गया। साजिश का जाल अब तैयार था।
वो खौफनाक रात: 4 दिसंबर 1973
4 दिसंबर की शाम को डॉ. जैन अपने क्लिनिक से घर लौटे। वो करीब 7:15 बजे डिफेंस कॉलोनी में अपने घर पहुँचे। उन्होंने विद्या से कहा कि वो तैयार हो जाएँ—दोनों को उनकी बहन के घर जाना था। उनकी कार पड़ोस के घर के बाहर खड़ी थी। विद्या तैयार हुईं और पति के साथ बाहर निकलीं।
डॉ. जैन कार की दाहिनी तरफ गए, ताकि दरवाज़ा खोल सकें। विद्या बाईं तरफ बढ़ीं। लेकिन जैसे ही डॉ. जैन ने चाबी निकाली, उन्हें कुछ अजीब लगा। विद्या गायब थीं। वो जल्दी से कार के दूसरी तरफ गए। वहाँ एक नाला था, और उसमें विद्या का शरीर पड़ा था—खून से लथपथ। तभी एक शख्स नाले से बाहर कूदा। उसने डॉ. जैन पर पिस्तौल तानी और अपने साथी के साथ उत्तर दिशा में भाग गया।
डॉ. जैन चिल्लाए। उनके मेहमान, ठाकुर राम सिंह और उनकी पत्नी किरण बाई, साथ ही नौकर कुंदन सिंह और गंगा सिंह, बाहर आए। सबने मिलकर विद्या को नाले से निकाला। उनके शरीर पर 14 चाकू के घाव थे—गले, सीने, और पेट पर। खून बह रहा था, और उनकी साँसें थम रही थीं। डॉ. जैन ने उन्हें कार में डाला और बहादुर शाह ज़फर मार्ग पर डॉ. एस.के. सेन के नर्सिंग होम ले गए। लेकिन वहाँ पहुँचते ही विद्या को मृत घोषित कर दिया गया।
पुलिस को बुलाया गया। शुरू में ये एक लूटपाट का मामला लगा। लेकिन जल्द ही सच्चाई सामने आने वाली थी।
पुलिस की जाँच: साजिश की परतें खुलीं
दिल्ली पुलिस के मशहूर इंस्पेक्टर फकीर चंद ने इस केस की जाँच शुरू की। सब-इंस्पेक्टर उदय चोपड़ा उनकी मदद कर रहे थे। शुरुआत में डॉ. जैन ने कहा कि दो अज्ञात लोग उनकी पत्नी पर हमला कर भाग गए। लेकिन कुछ सवालों ने पुलिस को शक में डाला।
- अगर हमला लूट के लिए था, तो डॉ. जैन को क्यों नहीं छुआ गया?
- विद्या के पास कोई कीमती चीज़ क्यों नहीं चुराई गई?
- हत्यारे इतने करीब थे, फिर भी डॉ. जैन ने शोर क्यों नहीं मचाया?
जाँच आगे बढ़ी। पुलिस को पता चला कि चंद्रेश शर्मा, जो पहले डॉ. जैन की सेक्रेटरी थी, अब भी उनके संपर्क में थी। उसे एक घर और हर महीने पैसे मिलते थे। फिर एक गवाह सामने आया—रामजी, वो टैक्सी ड्राइवर जिसे साजिश में शामिल किया गया था। उसने पुलिस को सब कुछ बता दिया।
रामजी ने बताया कि चंद्रेश ने उसे टैक्सी देने को कहा था। उस रात चंद्रेश और राकेश ने दो लोगों—कर्तार सिंह और उजागर सिंह—को विद्या के घर के पास भेजा। कर्तार ने विद्या को पकड़ा, और उजागर ने चाकू से हमला किया। चंद्रेश उस वक्त पास ही थी—डॉ. जैन की कार में। उसने हत्यारों को इशारा दिया था।
पुलिस ने राकेश, कर्तार, और उजागर को गिरफ्तार किया। चंद्रेश और डॉ. जैन को भी हिरासत में लिया गया। सबूतों का ढेर जमा हो गया—बैंक रिकॉर्ड, फिंगरप्रिंट, और खून से सने कपड़े। साजिश की हर परत खुलती गई।
कोर्ट में सुनवाई: न्याय की लड़ाई
मामला दिल्ली की सत्र अदालत में पहुँचा। जज एम.के. चावला ने सुनवाई की। अभियोजन पक्ष ने साबित किया कि ये एक सोची-समझी साजिश थी। डॉ. जैन, चंद्रेश, राकेश, कर्तार, उजागर, और दो अन्य—भगिरथ और कल्याण गुप्ता—पर IPC की धारा 120B (आपराधिक साजिश) और 302 (हत्या) के तहत मुकदमा चला। कर्तार और उजागर पर धारा 27 (हथियार रखने) का भी आरोप लगा।
सबूतों में शामिल थे:
- डॉ. जैन का बैंक रिकॉर्ड, जिसमें 10,000 रुपये निकालने का सबूत था।
- रामजी का बयान, जो सरकारी गवाह बन गया।
- हत्या में इस्तेमाल चाकू और पिस्तौल, जो कर्तार और उजागर से बरामद हुए।
31 जुलाई 1975 को फैसला आया। जज ने इसे "ठंडे दिमाग़ से की गई हत्या" करार दिया। डॉ. जैन और चंद्रेश को गहरे रिश्ते का सबूत मिला। कल्याण और भगिरथ को सिर्फ साजिश के लिए दोषी ठहराया गया, बाकी सभी को हत्या का दोषी माना गया। सजा थी—उम्रकैद।
लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई। दिल्ली हाई कोर्ट में अपील हुई। 1983 में हाई कोर्ट ने फैसला बदला। कर्तार और उजागर को फाँसी की सजा दी गई, क्योंकि वो "सीधे हत्यारे" थे। डॉ. जैन और चंद्रेश की सजा उम्रकैद ही रही। 9 अक्टूबर 1983 को तिहाड़ जेल में कर्तार और उजागर को फाँसी दे दी गई।
जेल से रिहाई: विवाद का अंत
डॉ. जैन और चंद्रेश को 1985 में रिहा कर दिया गया। जेल में उनके अच्छे व्यवहार का हवाला दिया गया। डॉ. जैन ने 11 साल और चंद्रेश ने करीब 12 साल जेल में बिताए। रिहाई के बाद दोनों की ज़िंदगी गुमनामी में चली गई। कुछ का कहना है कि वो अलग हो गए, कुछ का मानना है कि वो साथ रहे। लेकिन विद्या का खून उनके हाथों से कभी नहीं धुला।
समाज पर असर: एक सबक
"1973 का मशहूर मर्डर केस" ने देश को कई सवालों से रू-ब-रू किया। लोग हैरान थे कि एक पढ़ा-लिखा, सम्मानित शख्स ऐसा कैसे कर सकता है। इसने "भारत में कॉन्ट्रैक्ट किलिंग" की शुरुआत को चिह्नित किया। डिफेंस कॉलोनी जैसे पॉश इलाकों में भी लोग डरने लगे।
महिलाओं के लिए ये एक चेतावनी थी कि रिश्तों में विश्वासघात कितना खतरनाक हो सकता है। समाज ने ये भी देखा कि पैसा और रसूख सजा को कम कर सकते हैं। कर्तार और उजागर को फाँसी मिली, लेकिन साजिश के असली मास्टरमाइंड—डॉ. जैन और चंद्रेश—कम सजा के साथ बच निकले।
निष्कर्ष: एक कहानी जो सवाल छोड़ गई
"विद्या जैन हत्याकांड की पूरी कहानी" सिर्फ एक अपराध की घटना नहीं है। ये इंसानी रिश्तों की कमज़ोरी, लालच की भूख, और नैतिकता के पतन की कहानी है। डॉ. जैन एक हीरो से विलेन बन गए। चंद्रेश की चालाकी ने एक परिवार को तबाह कर दिया। और विद्या? वो एक ऐसी औरत थीं, जिनकी आवाज़ को हमेशा के लिए खामोश कर दिया गया।
ये कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है—क्या प्यार और विश्वास की कीमत खून से चुकानी पड़ती है? क्या न्याय हमेशा पूरा होता है? विद्या जैन की मौत सिर्फ एक हत्या नहीं थी—ये एक सबक थी, जो आज भी गूंजता है।
.png)