परिचय: एक रात का खौफनाक सच
जब मैं इस घटना के बारे में सोचता हूँ, तो मन में एक सवाल बार-बार उठता है—क्या प्यार और शक का ऐसा जहरीला मिश्रण हो सकता है जो किसी को इतना क्रूर बना दे? यह लेख उस रात की सच्चाई, जांच की परतें, लंबी कानूनी लड़ाई और इसके समाज पर प्रभाव को सामने लाने की कोशिश है। आइए, उस रात की दास्ताँ को करीब से देखें।
नैना साहनी: एक ज़िंदादिल औरत की कहानी
नैना साहनी का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था, लेकिन उसकी सोच साधारण से कहीं ऊपर थी। 29 साल की उम्र में वह एक कमर्शियल पायलट बन चुकी थी और दिल्ली में अपनी एक छोटी-सी बुटीक भी चलाती थी। उसकी शादी सुशील शर्मा से हुई थी, जो उस वक्त इंडियन नेशनल कांग्रेस के यूथ विंग में एक उभरता हुआ नेता था। बाहर से देखने में यह जोड़ा खुशहाल लगता था—नैना की मुस्कान और सुशील का रसूख लोगों को प्रभावित करता था। लेकिन घर की चारदीवारी के पीछे यह रिश्ता धीरे-धीरे नफरत और शक की आग में जल रहा था।
नैना एक आज़ाद ख्यालों वाली औरत थी। वह अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जीना चाहती थी। लेकिन सुशील को उसकी यह आज़ादी पसंद नहीं थी। उसे शक था कि नैना का अपने पुराने दोस्त और कांग्रेस कार्यकर्ता मटलूब करीम से अफेयर है। यह शक धीरे-धीरे जुनून में बदल गया, और फिर उस रात एक खौफनाक फैसले में।
सुशील शर्मा: सत्ता का नशा और शक की आग
सुशील शर्मा उस वक्त दिल्ली की सियासत में एक जाना-पहचाना नाम था। यूथ कांग्रेस का नेता होने के नाते उसके पास पैसा, रसूख और पहचान—सब कुछ था। लेकिन उसकी निजी ज़िंदगी में एक अंधेरा था जो बाहर कभी नहीं दिखा। नैना से शादी के बाद उसने उसे अपने काबू में रखना चाहा। जब नैना ने अपनी आज़ादी की बात की, तो सुशील का शक और गहरा हो गया। वह हर वक्त यह सोचता था कि नैना उसे धोखा दे रही है।
उस रात जब सुशील अपने गोले मार्केट वाले फ्लैट पर लौटा, तो उसने नैना को फोन पर किसी से बात करते देखा। नैना ने फोन काट दिया, लेकिन सुशील ने दोबारा नंबर डायल किया। दूसरी तरफ मटलूब की आवाज़ सुनते ही उसका गुस्सा फूट पड़ा। उसने अपनी रिवॉल्वर निकाली और नैना को गोली मार दी। नैना वहीं ढेर हो गई। लेकिन सुशील की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई—उसने जो आगे किया, वह इंसानियत को शर्मसार करने वाला था।
तंदूर की आग: एक लाश का अंत
नैना की हत्या के बाद सुशील ने उसके शव को ठिकाने लगाने का प्लान बनाया। उसने पहले शरीर को यमुना नदी में फेंकने की सोची, लेकिन आईटीओ ब्रिज पर ट्रैफिक देखकर वह पीछे हट गया। फिर उसने एक और रास्ता चुना—अशोक यात्री निवास (अब इंद्रप्रस्थ होटल) में बगिया बार-बेक्यू रेस्तरां का तंदूर। यह रेस्तरां सुशील के एक दोस्त केशव कुमार के ज़रिए चलता था। सुशील ने अपनी मारुति कार में नैना का शव रखा और उसे रेस्तरां ले गया।
वहाँ उसने शव को टुकड़ों में काटा। फिर तंदूर में लकड़ी और मक्खन डालकर आग जलाई और नैना के शरीर के हिस्सों को उसमें डाल दिया। आग की लपटें ऊँची उठने लगीं, और धुआँ छत तक पहुँच गया। यह नज़ारा इतना भयानक था कि कोई भी देखकर सिहर उठे। लेकिन सुशील का इरादा सबूत मिटाने का था—वह नहीं चाहता था कि नैना की मौत का कोई निशान बचे।
पुलिस की नज़र: सच का खुलासा
उसी रात दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल अब्दुल नज़ीर कुंजू और होम गार्ड चंदरपाल अशोक रोड पर गश्त कर रहे थे। रात करीब 11 बजे उन्होंने होटल की छत से धुआँ उठते देखा। कुछ गड़बड़ लगी तो वे दीवार फाँदकर अंदर घुसे। तंदूर से आग की लपटें उठ रही थीं। पास जाकर देखा तो उन्हें एक जलता हुआ मानव शरीर दिखा। कांस्टेबल कुंजू ने बाद में कहा, “मेरे रोंगटे खड़े हो गए। आग में एक औरत का धड़ था, उसकी त्वचा पिघल रही थी।”
पुलिस ने तुरंत आग बुझाई। वहाँ मौजूद केशव कुमार ने कहा कि वे पुराने कांग्रेस बैनर जला रहे हैं, लेकिन उसकी बातों में दम नहीं था। सुशील मौके से भाग चुका था। पुलिस ने केशव को हिरासत में लिया और जांच शुरू की। अगले दिन फ्लैट से खून के निशान, गोली के खोल और नैना की चीज़ें मिलीं। दूसरी ऑटोप्सी में पता चला कि नैना के सिर और गर्दन में दो गोलियाँ थीं—यह हत्या का पक्का सबूत था।
सुशील का भागना और सरेंडर
हत्या के बाद सुशील फरार हो गया। वह पहले जयपुर गया, फिर मुंबई, चेन्नई और आखिरकार बंगलुरु। दिल्ली पुलिस की एक टीम, जिसकी अगुवाई मैक्सवेल परेरा कर रहे थे, उसके पीछे लगी थी। 10 जुलाई 1995 को सुशील ने बंगलुरु में सरेंडर कर दिया। उसने दावा किया कि उसे नैना की मौत के बारे में कुछ नहीं पता, और वह तीर्थयात्रा पर था। लेकिन सबूतों ने उसकी सारी कहानी झूठी साबित कर दी।
कोर्ट में जंग: सजा का लंबा सफर
27 जुलाई 1995 को पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की। ट्रायल कोर्ट में मामला शुरू हुआ। सुशील और केशव पर हत्या, साजिश और सबूत मिटाने के आरोप लगे। 7 नवंबर 2003 को सेशंस कोर्ट ने सुशील को फाँसी की सजा सुनाई, जबकि केशव को 7 साल की सख्त सजा मिली। जज जीपी थरेजा ने लिखा, “शव को जलाकर सुशील ने चाहा कि नैना की याद हमेशा के लिए मिट जाए।”
सुशील ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की, लेकिन 19 फरवरी 2007 को हाई कोर्ट ने भी फाँसी की सजा बरकरार रखी। कोर्ट ने कहा, “ऐसे लोग जो सत्ता के नशे में इंसानी जान की कदर नहीं करते, समाज के लिए खतरा हैं।” लेकिन 8 अक्टूबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी सजा को उम्रकैद में बदल दिया। कोर्ट ने कहा कि यह “रेयर ऑफ रेयरेस्ट” मामला नहीं था, और शव को काटने का कोई पक्का सबूत नहीं मिला।
रिहाई का विवाद: क्या यह न्याय था?
20 दिसंबर 2018 को दिल्ली हाई कोर्ट ने सुशील की रिहाई का आदेश दिया। उसने 23 साल जेल में बिताए थे। कोर्ट ने कहा कि उसने अपनी सजा पूरी कर ली है, और उसे रिहा करना उसके मानवाधिकारों का हिस्सा है। 22 दिसंबर को सुशील तिहाड़ जेल से बाहर आया। उसने कहा, “मेरी ज़िंदगी अब एक कोरा कागज़ है। मैं अपने बूढ़े माँ-बाप की सेवा करना चाहता हूँ।” लेकिन नैना के चाहने वालों के लिए यह फैसला एक धक्का था। लोगों ने पूछा—क्या यह “न्याय की लड़ाई” का सही अंत था?
समाज पर असर: एक सबक की कहानी
“तंदूर मर्डर केस” ने दिल्ली और देश को कई सवाल दिए। यह दिखाता है कि शक और गुस्सा इंसान को कहाँ तक ले जा सकता है। सुशील जैसे रसूखदार लोग कानून से बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन जनता और मीडिया की ताकत ने इस केस को ज़िंदा रखा। इसने “दिल्ली क्राइम” की दुनिया में एक नई मिसाल कायम की—कि सत्ता कितनी भी बड़ी हो, सच सामने आ ही जाता है।
महिलाओं की सुरक्षा पर भी सवाल उठे। नैना एक आज़ाद औरत थी, लेकिन उसकी आज़ादी ही उसके लिए खतरा बन गई। इस केस ने यह भी दिखाया कि फॉरेंसिक साइंस कितनी अहम हो सकती है—दूसरी ऑटोप्सी ने ही असली कहानी उजागर की।
नैना की याद: एक अधूरी कहानी
मैं जब नैना के बारे में सोचता हूँ, तो उसकी हँसी और सपने याद आते हैं। एक औरत जो पायलट थी, जो अपने पैरों पर खड़ी थी, वह एक रात में सब कुछ खो बैठी। उसकी मौत सिर्फ एक हत्या नहीं थी—यह एक चेतावनी थी कि रिश्तों में भरोसा और समझ कितनी ज़रूरी है। सुशील को सजा मिली, लेकिन नैना की ज़िंदगी तो लौट नहीं सकती।
निजी नज़रिया: एक दर्द जो भूलता नहीं
इस केस को लिखते वक्त मुझे बार-बार वह तंदूर की आग याद आई। एक इंसान कैसे इतना क्रूर हो सकता है? यह कहानी मुझे सिखाती है कि गुस्सा और शक कितने खतरनाक हो सकते हैं। यह एक सबक है—हमारे लिए, हमारे समाज के लिए। अगर सुशील ने एक पल रुककर सोचा होता, तो शायद नैना आज ज़िंदा होती।
निष्कर्ष: सवाल जो बाकी हैं
“तंदूर मर्डर केस” एक हत्या से कहीं ज़्यादा है। यह ईर्ष्या की आग, सत्ता का नशा और न्याय की जटिलता की कहानी है। सुशील को सजा मिली, फिर रिहाई भी। लेकिन क्या यह पूरा न्याय था? क्या नैना की चीख हमें कुछ सिखा पाई? आप क्या सोचते हैं—क्या यह कहानी हमें बदलने के लिए काफी थी, या सिर्फ एक और भूली हुई सुर्खी बनकर रह गई?
.png)