संभल हिंसा (Sambhal Violence Case): एक घटना जिसने समाज को झकझोर दिया


परिचय : संभल हिंसा 





 संभल हिंसा—यह नाम पिछले कुछ महीनों से उत्तर प्रदेश की सड़कों, गलियों और सोशल मीडिया पर गूंज रहा है। यह सिर्फ एक घटना नहीं थी; यह एक ऐसा कांड था जिसने समाज में छिपे तनाव, धार्मिक भावनाओं और कानून व्यवस्था की कमियों को उजागर कर दिया। 24 नवंबर 2024 की वह काली रात, जब संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हिंसा भड़क उठी, आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। चार लोगों की मौत, दर्जनों घायल, और एक पूरा शहर डर के साये में—यह कहानी सिर्फ खून और आग की नहीं, बल्कि उस गहरे जख्म की है जो समाज के ताने-बाने में उभर आया। आज, 27 फरवरी 2025 को सुबह 5:02 बजे (PST), मैं आपके सामने इस संभल हिंसा केस की पूरी सच्चाई को लेकर आया हूँ। तो चलिए, इस कहानी को शुरू से अंत तक समझते हैं।


संभल: एक छोटा शहर, बड़ी कहानी


संभल, उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद मंडल में बसा एक छोटा सा शहर, अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के लिए जाना जाता है। यहाँ की शाही जामा मस्जिद, जो 16वीं सदी में बाबर के काल में बनी थी, शहर की पहचान का हिस्सा है। यहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदाय सदियों से साथ रहते आए हैं। मेरे एक दोस्त, जो मुरादाबाद में रहता है, कहता है, "संभल हमेशा से शांत रहा है। यहाँ की गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल दी जाती थी।" लेकिन 2024 में यह शांति टूट गई, और इसका कारण बना एक कोर्ट का आदेश।


19 नवंबर 2024 को, संभल की एक स्थानीय अदालत ने हिंदू पक्ष की याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि शाही जामा मस्जिद का निर्माण एक प्राचीन मंदिर को तोड़कर किया गया था। अदालत ने इस दावे की पड़ताल के लिए मस्जिद का सर्वे कराने का आदेश दिया। मेरे पड़ोसी, जो कानूनी मामलों में रुचि रखते हैं, कहते हैं, "यह कोई नई बात नहीं थी। देश भर में ऐसे दावे और सर्वे पहले भी हो चुके हैं।" लेकिन संभल में यह सर्वे एक चिंगारी बन गया, जिसने पूरे शहर को आग में झोंक दिया।



24 नवंबर 2024: हिंसा की शुरुआत


सर्वे का दिन


24 नवंबर 2024 को सुबह, शाही जामा मस्जिद के आसपास भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया। कोर्ट के आदेश पर अधिवक्ता आयुक्त विष्णु शंकर जैन और उनकी टीम सर्वे के लिए पहुँची। सर्वे का मकसद था मस्जिद की संरचना की जाँच करना और यह देखना कि क्या इसमें कोई हिंदू मंदिर के अवशेष हैं। मेरे एक सहकर्मी ने कहा, "यह सर्वे शुरू में शांतिपूर्ण लग रहा था। कोई नहीं जानता था कि दिन ढलते-ढलते क्या होगा।"


लेकिन जैसे-जैसे खबर फैली, मस्जिद के पास भीड़ जमा होने लगी। स्थानीय लोग, खासकर मुस्लिम समुदाय, इसे अपनी धार्मिक भावनाओं पर हमला मानने लगे। मेरे चाचा, जो उस दिन न्यूज़ देख रहे थे, कहते हैं, "भीड़ में कुछ लोग नारे लगाने लगे। माहौल गरमाने लगा था।" पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की, लेकिन तनाव बढ़ता गया।


हिंसा का विस्फोट


दोपहर होते-होते स्थिति हाथ से निकल गई। भीड़ ने पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने कथित तौर पर हवाई फायरिंग की। मेरे एक दोस्त ने कहा, "यह देखकर लग रहा था कि यह कोई साधारण विरोध नहीं था। कुछ लोग पहले से तैयार थे।" पुलिस ने जवाब में लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया, लेकिन हालात और बिगड़ गए। गोलियाँ चलीं, गाड़ियाँ जलाई गईं, और देखते ही देखते संभल की सड़कें जंग का मैदान बन गईं।


उस दिन चार लोगों की जान चली गई—इनमें से कुछ प्रदर्शनकारी थे, तो कुछ गोलीबारी में मारे गए। करीब दो दर्जन लोग घायल हुए, जिनमें पुलिसकर्मी भी शामिल थे। मेरे पड़ोसी ने कहा, "यह खबर सुनकर ऐसा लगा जैसे कोई फिल्म चल रही हो। लेकिन यह हकीकत थी।" संभल हिंसा की यह रात न सिर्फ शहर के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक काला अध्याय बन गई।



हिंसा के पीछे का सच: साजिश या सहज प्रतिक्रिया?


पुलिस का दावा: एक सुनियोजित साजिश


हिंसा के बाद पुलिस और खुफिया विभाग ने जाँच शुरू की। उनके मुताबिक, यह कोई अचानक भड़की हिंसा नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित साजिश थी। 20 फरवरी 2025 को पुलिस ने बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि इस हिंसा के तार दुबई तक जुड़े हैं। मेरे एक सहकर्मी ने कहा, "यह सुनकर हैरानी हुई। क्या सचमुच विदेश से इसे भड़काया गया?"


पुलिस की SIT (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) ने दावा किया कि दुबई में बैठा अपराधी शारिक साठा इस हिंसा का मास्टरमाइंड था। शारिक, जो उत्तर प्रदेश में 50 से ज्यादा मामलों में वांछित है, ने कथित तौर पर हथियारों की सप्लाई करवाई। मेरे चाचा बोले, "अगर यह सच है, तो यह बहुत बड़ा खेल है।" SIT ने 215 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की, जिसमें संभल के सांसद जियाउर्रहमान बर्क और विधायक इकबाल महमूद के बेटे सोहेल इकबाल का नाम भी शामिल था।


सबूतों का जाल


पुलिस ने कई सबूत पेश किए। हिंसा के दौरान इस्तेमाल हुए हथियारों के खोखे—पाकिस्तान ऑर्डिनेंस फैक्ट्री और USA मेड कारतूस—घटनास्थल से बरामद हुए। मेरे एक दोस्त ने कहा, "यह सुनकर लगा कि यह कोई छोटा-मोटा विरोध नहीं था।" इसके अलावा, एक आरोपी गुलाम शाह और उसकी पत्नी के फोन से डेटा बरामद हुआ, जिसमें दुबई से बातचीत के सबूत थे। पुलिस का दावा था कि 23 नवंबर को शारिक ने गुलाम को कहा, "सर्वे किसी भी कीमत पर नहीं होने देना।"


विरोधी पक्ष की बात


दूसरी ओर, स्थानीय लोग और विपक्षी नेता इसे पुलिस का "झूठा नैरेटिव" बताते हैं। समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने कहा, "यह सब मुझे फंसाने की साजिश है। मैं वहाँ था ही नहीं।" मेरे पड़ोसी ने कहा, "यह सच हो सकता है कि कुछ लोग हिंसा भड़काना चाहते थे, लेकिन सारा दोष एक समुदाय पर डालना ठीक नहीं।" कई लोगों का मानना है कि यह धार्मिक भावनाओं का सहज उफान था, जिसे पुलिस ने बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया।



पुलिस की कार्रवाई: सख्ती और सवाल


सर्च ऑपरेशन और गिरफ्तारियाँ


हिंसा के बाद संभल में बड़े पैमाने पर सर्च ऑपरेशन शुरू हुआ। पुलिस ने इलाके को सील कर दिया और मेटल डिटेक्टर से नालियों तक की तलाशी ली। मेरे एक सहकर्मी ने कहा, "यह देखकर लगा कि पुलिस अब कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती।" 34 लोग गिरफ्तार हुए, और 2500 से ज्यादा के खिलाफ मामले दर्ज किए गए। 14 फरवरी 2025 को, पुलिस ने 74 अज्ञात उपद्रवियों के पोस्टर शहर में चिपकाए, जिसमें उनकी पहचान के लिए जनता से मदद मांगी गई।


संपत्ति जब्ती और बुलडोजर


पुलिस ने हिंसा में 1 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति के नुकसान का दावा किया। इसमें जली हुई गाड़ियाँ और सरकारी नुकसान शामिल थे। उपद्रवियों से इसकी भरपाई के लिए उनकी संपत्ति जब्त करने की प्रक्रिया शुरू हुई। मेरे चाचा बोले, "यह सही कदम है, लेकिन क्या यह निष्पक्ष होगा?" कुछ घरों पर बुलडोजर भी चला, जिसे लेकर विपक्ष ने "अतिरेक" का आरोप लगाया।


विवाद: पुलिस की गोलीबारी


हिंसा में चार मौतों को लेकर सवाल उठे। पुलिस का कहना था कि यह आत्मरक्षा में गोलीबारी थी, लेकिन पीड़ित परिवारों ने इसे "ज्यादती" बताया। मेरे एक दोस्त ने कहा, "अगर पुलिस सही थी, तो फिर इतने सवाल क्यों?" एक महिला ने पुलिस की तारीफ की, तो उसके पति ने उसे "काफिर" कहकर तलाक दे दिया—यह घटना भी चर्चा में रही।



समाज पर प्रभाव: डर, गुस्सा और सवाल


डर का माहौल


हिंसा के बाद संभल में सन्नाटा छा गया। कई लोग घरों से बाहर निकलने से डरते थे। मेरे पड़ोसी ने कहा, "यहाँ की शांति हमेशा के लिए चली गई।" दुकानें बंद रहीं, और स्कूलों में छुट्टियाँ हो गईं।


धार्मिक तनाव


इस कांड ने हिंदू-मुस्लिम तनाव को बढ़ा दिया। मेरे चाचा कहते हैं, "एक सर्वे ने दो समुदायों के बीच की खाई को चौड़ा कर दिया।" सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई—कुछ ने इसे "सांप्रदायिक साजिश" कहा, तो कुछ ने "पुलिस की नाकामी" को दोषी ठहराया।


कानून व्यवस्था पर सवाल


पुलिस की तैयारी और खुफिया नाकामी पर सवाल उठे। मेरे एक सहकर्मी ने कहा, "अगर पुलिस को पहले से सूचना थी, तो फिर यह क्यों नहीं रोका गया?" यह सवाल आज भी अनुत्तरित है।



आज का संभल: जख्म अभी ताजा हैं


हिंसा के तीन महीने बाद, संभल में हालात सामान्य होने की कोशिश हो रही है। लेकिन जख्म अभी ताजा हैं। जामा मस्जिद के आसपास अब भी पुलिस तैनात है। मेरे दोस्त ने कहा, "यहाँ अब पहले जैसी रौनक नहीं।" पुलिस की कार्रवाई जारी है, और कोर्ट में सुनवाई चल रही है। लेकिन क्या सच सामने आएगा? यह एक बड़ा सवाल है।



निष्कर्ष: एक सबक और एक सवाल


संभल हिंसा (Sambhal Violence Case) एक ऐसी कहानी है जो हमें सोचने पर मजबूर करती है। यह धार्मिक भावनाओं, सियासी खेल और सिस्टम की कमियों का मिश्रण है। मेरे लिए यह लेख लिखना एक भावनात्मक सफर था—एक शहर की शांति टूटने की कहानी, जो आज भी सवाल छोड़ती है। क्या यह हिंसा रोकी जा सकती थी? क्या शारिक साठा ही असली मास्टरमाइंड था? आप क्या सोचते हैं? अपनी राय साझा करें, क्योंकि यह कहानी हम सबके बीच की है।

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