रमन राघव: 1960 के दशक का मुंबई का खूंखार सीरियल किलर

 लेखक: अतीत की परछाइयों से


प्रकाशन तिथि: 05 मार्च 2025

शब्द संख्या: ~3,900

परिचय: वो रातें जब मुंबई डर से काँप उठी



1960 का दशक—एक ऐसा समय जब मुंबई अपने सुनहरे दौर में थी। फिल्मों की चमक, मिलों की गूंज, और सपनों का पीछा करने वालों की भीड़। लेकिन इसी शहर की सड़कों पर एक ऐसा शख्स घूम रहा था, जिसके हाथों में खून की स्याही थी और मन में मौत का जुनून। उसका नाम था रमन राघव—एक सीरियल किलर, जिसने मुंबई के गरीब इलाकों में आतंक मचा दिया। उसने 41 से ज्यादा लोगों की हत्या की, ज्यादातर गरीब मजदूर और बेघर लोग, जो रात के अंधेरे में सोते थे। उसका हथियार था एक लोहे का डंडा, और उसकी क्रूरता ऐसी थी कि लोग उसे "साइको किलर" कहने लगे।

1968 में जब उसे पकड़ा गया, तो उसकी कहानी ने सबको हिलाकर रख दिया। वो कोई चालाक अपराधी नहीं था, न ही उसका कोई ठोस मकसद था। वो बस मारता था—बिना डर, बिना पछतावे। आज भी रमन राघव की कहानी भारत के अपराध इतिहास में एक काले अध्याय की तरह दर्ज है। आइए, इस खूंखार हत्यारे की पूरी कहानी को करीब से देखें—एक ऐसी कहानी जो डराती है, सोचने पर मजबूर करती है, और इंसानी मन की गहराइयों को टटोलती है।

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शुरुआती जीवन: एक साधारण आदमी का अंधेरा सफर

रमन राघव का जन्म 1929 में हुआ था, हालाँकि उसकी सही तारीख और जगह के बारे में कोई ठोस सबूत नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि वो तमिलनाडु के तिरुनलवेली जिले से था, तो कुछ का मानना है कि वो महाराष्ट्र के सतारा से आया था। उसका असली नाम रमाकांत राघव था, लेकिन वो रमन राघव के नाम से मशहूर हुआ। उसका बचपन गरीबी में बीता। परिवार में माता-पिता और कुछ भाई-बहन थे, लेकिन ज्यादा जानकारी नहीं मिलती।

रमन ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था। उसने छोटी-मोटी नौकरियाँ कीं—खेतों में मजदूरी, ढाबों पर बर्तन धोना, और फिर शहर की ओर रुख किया। 1950 के दशक में वो मुंबई पहुँचा—उस शहर में, जो उस समय "मायानगरी" कहलाता था। यहाँ उसने मिलों में काम किया, रिक्शा खींचा, और सड़कों पर भटकता रहा। लेकिन उसकी जिंदगी में कुछ ऐसा हुआ, जिसने उसे एक हत्यारे में बदल दिया।

कहा जाता है कि उसकी शादी हुई थी, लेकिन उसकी पत्नी और बच्चे उसे छोड़कर चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि ये घटना उसके मन में गहरी चोट बन गई। वो अकेला हो गया, और उसका गुस्सा, उसकी कुंठा, बाहर निकलने लगी। लेकिन क्या ये सच था, या सिर्फ एक कहानी? रमन ने कभी इसका जवाब नहीं दिया।


हत्याओं की शुरुआत: खून का पहला निशान

रमन की हत्याओं का सिलसिला 1960 के मध्य में शुरू हुआ, हालाँकि सटीक तारीख बताना मुश्किल है। उसका पहला शिकार कौन था, ये भी कोई नहीं जानता। लेकिन 1966 तक उसका नाम मुंबई के पूर्वी उपनगरों—घाटकोपर, भांडुप, और विक्रोली—में फैलने लगा था। वो रात के अंधेरे में निकलता, अपने साथ एक भारी लोहे का डंडा लिए। उसका निशाना होते थे गरीब लोग—मजदूर, भिखारी, या वो बेघर जो झोपड़ियों में सोते थे।

उसकी हत्या का तरीका बेहद क्रूर था। वो सोते हुए लोगों के सिर पर डंडा मारता—एक बार, दो बार, जब तक उनकी खोपड़ी न टूट जाए। वो उनके चेहरे को कुचल देता, और फिर चुपचाप गायब हो जाता। उसका कोई पैटर्न नहीं था, कोई मकसद नहीं दिखता था। वो बस मारता था, जैसे ये उसका रोज़ का काम हो।

1966 से 1968 के बीच उसने दर्जनों हत्याएँ कीं। पुलिस को शुरुआत में समझ नहीं आया कि ये एक ही शख्स का काम है। लोग इसे "स्टोनमैन" समझने लगे—एक रहस्यमयी हत्यारा जो पत्थरों से मारता है। लेकिन बाद में पता चला कि ये रमन राघव था, और उसका हथियार पत्थर नहीं, बल्कि लोहे का डंडा था।


मुंबई में आतंक: 1968 का खूनी साल

1968 रमन के लिए सबसे खतरनाक साल था। उसने अपनी हत्याओं को तेज़ कर दिया। अगस्त 1968 में उसने एक ही रात में चार लोगों को मार डाला—सभी घाटकोपर के एक झोपड़पट्टी इलाके में। लोग रात को सोने से डरने लगे। सड़कों पर सन्नाटा पसर गया। बच्चे, बूढ़े, जवान—कोई भी सुरक्षित नहीं था।

एक घटना में उसने एक परिवार को निशाना बनाया। एक मजदूर, उसकी पत्नी, और उनके दो बच्चों को सोते वक्त मार डाला। सुबह जब पड़ोसियों ने देखा, तो वहाँ खून ही खून था। रमन का कोई सुराग नहीं था। वो जंगल में छिपता, नालों के पास सोता, और फिर अगले शिकार की तलाश में निकल पड़ता।

उसके शिकार ज्यादातर गरीब थे। शायद इसलिए पुलिस ने शुरू में इसकी ज्यादा परवाह नहीं की। लेकिन जब हत्याएँ 30 को पार कर गईं, तो मुंबई पुलिस पर दबाव बढ़ा। अखबारों में सुर्खियाँ छपने लगीं—"मुंबई का खूंखार हत्यारा कौन?" लोग उसे "रिपर" और "साइको" कहने लगे।


पुलिस की तलाश: एक हत्यारे का पीछा

1968 में मुंबई पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लिया। डिप्टी कमिश्नर रामकृष्ण गणपत पाटिल ने जांच की कमान संभाली। पुलिस को पता था कि ये एक अकेला हत्यारा है, क्योंकि हत्याओं का तरीका एक जैसा था। लेकिन उसे पकड़ना आसान नहीं था। रमन के पास कोई घर नहीं था, कोई पहचान नहीं थी। वो भीड़ में गायब हो जाता था।

पुलिस ने गश्त बढ़ाई। जंगल, झोपड़ियाँ, और नाले छान मारे गए। फिर एक सुराग मिला—एक मजदूर ने बताया कि उसने एक लंबे, पतले शख्स को लोहे का डंडा लिए देखा था। उसकी उम्र 30-35 के बीच थी, और वो गंदे कपड़ों में था। पुलिस ने उसका स्केच बनवाया और पूरे शहर में बाँट दिया।

अगस्त 1968 में एक सब-इंस्पेक्टर, एलेक्स फियाल्हो, ने रमन को घाटकोपर में देखा। वो एक झोपड़ी के पास संदिग्ध हालत में खड़ा था। जब पुलिस ने उसे रोका, तो वो भागने लगा। लेकिन इस बार वो बच नहीं सका। उसे पकड़ लिया गया, और उसकी जेब से एक खून से सना डंडा बरामद हुआ।


पूछताछ: एक साइको का दिमाग

जब रमन को पुलिस स्टेशन लाया गया, तो उसका रवैया हैरान करने वाला था। वो शांत था, बिना डर के। उसने अपने अपराध कबूल कर लिए—41 हत्याएँ, बिना किसी झिझक के। उसने कहा, "मुझे मारना अच्छा लगता है। लोग मेरे रास्ते में आते थे, तो मैं उन्हें हटा देता था।"

पुलिस ने उससे पूछा, "तुमने ऐसा क्यों किया?" उसका जवाब था, "मुझे सपनों में आवाज़ें सुनाई देती थीं। वो मुझे कहती थीं कि मारो।" उसने ये भी दावा किया कि वो एक "सिंधु भगवान" का भक्त था, और उसे बलि देने का आदेश मिला था। लेकिन पुलिस को ये सब पागलपन लगा।

डॉक्टरों ने उसकी मानसिक जांच की। उसे "पैरानॉयड स्किजोफ्रेनिया" का मरीज बताया गया। उसका दिमाग सामान्य नहीं था—वो हकीकत और सपनों में फर्क नहीं कर पाता था। लेकिन क्या ये सच था, या उसकी चाल थी सजा से बचने की?


कोर्ट में सुनवाई: सजा का फैसला

रमन पर हत्या के कई मामले दर्ज हुए। उसका मुकदमा मुंबई की सत्र अदालत में चला। अभियोजन पक्ष ने 41 हत्याओं के सबूत पेश किए—खून से सने हथियार, गवाहों के बयान, और उसकी कबूलनामा। बचाव पक्ष ने कहा कि वो पागल है, उसे सजा नहीं, इलाज चाहिए।

1969 में कोर्ट ने फैसला सुनाया। जज ने माना कि रमन मानसिक रूप से बीमार था। लेकिन उसकी क्रूरता को देखते हुए उसे फाँसी की सजा दी गई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस सजा को उम्रकैद में बदल दिया, क्योंकि उसकी मानसिक हालत को ध्यान में रखा गया।


जेल में आखिरी दिन: एक हत्यारे का अंत

रमन को पुणे की यरवदा जेल में रखा गया। वहाँ वो चुपचाप रहा। वो न तो कैदियों से बात करता, न ही गार्ड्स से। 1995 में उसकी तबीयत बिगड़ी—किडनी फेल हो गई। उसे ससून अस्पताल में भर्ती किया गया, जहाँ 13 अगस्त 1995 को उसकी मौत हो गई। वो 66 साल का था।

उसके मरने की खबर ज्यादा सुर्खियों में नहीं आई। लोग उसे भूल चुके थे। लेकिन उसकी कहानी आज भी मुंबई के इतिहास में दर्ज है।


समाज पर असर: एक सबक

रमन राघव ने मुंबई को डर सिखाया। गरीब इलाकों में लोग रात को जागने लगे। पुलिस ने गश्त बढ़ाई। इसने ये भी दिखाया कि मानसिक बीमारी कितनी खतरनाक हो सकती है। आज भी लोग उसे "मुंबई के खूंखार हत्यारे" के रूप में याद करते हैं।


निष्कर्ष: अंधेरे की वो परछाई

रमन राघव की पूरी कहानी एक रहस्य है। 1960 के सीरियल किलर ने न सिर्फ जिंदगियाँ छीनीं, बल्कि समाज को सोचने पर मजबूर किया। क्या वो सिर्फ एक पागल था, या कुछ और? उसका अंत हो गया, लेकिन उसके सवाल आज भी जिंदा हैं।

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