धनंजय चटर्जी रेप और मर्डर (1990): एक अपराध जिसने देश को हिलाकर रख दिया

लेखक: एक सत्य की खोज में


प्रकाशन तिथि: 05 मार्च 2025

परिचय: वो दिन जब मासूमियत दफन हुई



5 मार्च 1990 का दिन कोलकाता के भवानीपुर इलाके के लिए एक साधारण दिन था। सूरज ढल रहा था, लोग अपने घरों को लौट रहे थे, और बच्चे स्कूल से वापस आ रहे थे। लेकिन उस दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने न सिर्फ कोलकाता को, बल्कि पूरे भारत को हिला दिया। हेतल पारेख, एक 18 साल की स्कूली छात्रा, अपने घर में मृत पाई गई। उसका शव खून से लथपथ था, और उसके साथ बलात्कार की क्रूरता हुई थी। इस जघन्य अपराध का आरोपी था धनंजय चटर्जी—एक सिक्योरिटी गार्ड, जिस पर उसी अपार्टमेंट की सुरक्षा का जिम्मा था जहाँ हेतल रहती थी।

14 साल बाद, 14 अगस्त 2004 को, धनंजय को अलीपुर जेल में फाँसी दे दी गई। ये 21वीं सदी में भारत की पहली न्यायिक फाँसी थी। लेकिन क्या ये कहानी इतनी साधारण थी? क्या धनंजय वाकई दोषी था, या उसे एक ऐसी सजा मिली जो शायद उसे नहीं मिलनी चाहिए थी? ये लेख आपको उस सच तक ले जाएगा—एक ऐसी कहानी जो अपराध, न्याय, और इंसानियत के सवालों को छूती है। आइए, धनंजय चटर्जी केस की पूरी कहानी को गहराई से जानें।

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धनंजय का जीवन: गरीबी से अपराध तक का सफर

धनंजय चटर्जी का जन्म 14 अगस्त 1965 को पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले के कुलुडीहि गाँव में हुआ था। उसका परिवार गरीब था—पिता मजदूरी करते थे, और माँ घर संभालती थी। धनंजय की पढ़ाई ज्यादा नहीं हुई; उसने मुश्किल से हाई स्कूल तक पढ़ाई की। गाँव में रोजगार के अवसर कम थे, इसलिए वो कोलकाता आ गया—उस शहर में, जो सपनों का पीछा करने वालों को अपनी ओर खींचता है।

कोलकाता में उसने सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी शुरू की। उसकी शादी पूर्णिमा से हुई, जो बाद में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता बनी। धनंजय की जिंदगी साधारण थी—सुबह ड्यूटी, शाम को घर, और महीने के अंत में तनख्वाह। 1989 में उसे भवानीपुर के आनंद अपार्टमेंट में तैनात किया गया। ये एक मध्यमवर्गीय इलाका था, जहाँ लोग शांति और सुरक्षा की उम्मीद करते थे। लेकिन धनंजय की जिंदगी में शांति ज्यादा दिन नहीं टिकी।

कहा जाता है कि धनंजय का स्वभाव मिलनसार था, लेकिन कुछ लोग उसे चुप और रहस्यमयी भी बताते थे। क्या उसके मन में कोई अंधेरा छिपा था? ये सवाल बाद में उठा, जब उस पर हेतल की हत्या का इल्ज़ाम लगा।


हेतल पारेख: एक मासूम जिंदगी

हेतल पारेख 18 साल की थी—एक उम्र, जहाँ सपने बड़े होते हैं और जिंदगी रंगों से भरी होती है। वो भवानीपुर के एक मशहूर स्कूल में पढ़ती थी और 12वीं कक्षा में थी। उसकी माँ, यशोमति पारेख, एक गृहिणी थीं, और पिता का देहांत हो चुका था। हेतल अपनी माँ की इकलौती संतान थी—उनका सहारा, उनकी दुनिया।

स्कूल में हेतल को एक होनहार छात्रा माना जाता था। वो पढ़ाई में अच्छी थी और दोस्तों के बीच हँसमुख। उसकी सहेलियाँ बताती थीं कि उसे किताबें पढ़ना और संगीत सुनना पसंद था। उसकी माँ उसे कॉलेज भेजने की तैयारी कर रही थीं। लेकिन 5 मार्च 1990 को वो सारी उम्मीदें चकनाचूर हो गईं।

उस दिन हेतल स्कूल से दोपहर करीब 2 बजे लौटी। उसकी माँ शाम को पास के मंदिर गई थीं, जो उनकी रोज़ की आदत थी। हेतल घर में अकेली थी—एक ऐसा मौका, जो शायद किसी दरिंदे की नजर में आ गया।


अपराध का दिन: 5 मार्च 1990

शाम करीब 5 बजे के आसपास, आनंद अपार्टमेंट में कुछ गलत होने की आहट किसी को नहीं थी। धनंजय की ड्यूटी सुबह की शिफ्ट में थी, जो दोपहर 2 बजे खत्म हो चुकी थी। लेकिन कई गवाहों—लिफ्टमैन प्रकाश राव, एक पड़ोसी श्रीमती दास, और एक अन्य सिक्योरिटी गार्ड—ने बताया कि उन्होंने उसे शाम को अपार्टमेंट में देखा।

5:30 से 5:45 के बीच, हेतल के साथ वो भयानक घटना हुई। जब यशोमति करीब 6 बजे मंदिर से लौटीं, तो उन्होंने दरवाजा खटखटाया। कोई जवाब नहीं आया। चिंता बढ़ी, उन्होंने पड़ोसियों को बुलाया। दरवाजा तोड़ा गया, और अंदर का मंजर किसी के लिए भी सहन करना मुश्किल था। हेतल का शव फर्श पर पड़ा था। उसकी स्कूल यूनिफॉर्म फटी हुई थी, गले पर निशान थे, और खून चारों तरफ बिखरा था।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने सच्चाई सामने लाई—उसके साथ बलात्कार हुआ था, और फिर गला घोंटकर हत्या की गई थी। उसकी कलाई पर चोट के निशान थे, जैसे उसने बचने की कोशिश की हो। ये दृश्य आज भी उन लोगों के जेहन में ताज़ा है, जो उस दिन वहाँ थे।


पुलिस जांच: धनंजय पर शक की सुई

हत्या की खबर फैलते ही भवानीपुर पुलिस स्टेशन में हड़कंप मच गया। FIR दर्ज हुई, और जांच कोलकाता पुलिस की डिटेक्टिव डिपार्टमेंट को सौंपी गई। इंस्पेक्टर सुब्रत मित्रा ने केस की कमान संभाली। शुरुआती तफ्तीश में कई सवाल उठे—कौन था अपराधी? मकसद क्या था?

जांच की नजर सबसे पहले अपार्टमेंट के कर्मचारियों पर गई। धनंजय पर शक इसलिए गहराया, क्योंकि वो घटना के बाद से गायब था। पुलिस ने गवाहों के बयान लिए। लिफ्टमैन ने बताया कि उसने धनंजय को शाम 5 बजे के करीब लिफ्ट में देखा था। एक पड़ोसी ने कहा कि उसने हेतल के फ्लैट की तरफ जाते हुए उसे देखा। ये बयान परिस्थितिजन्य सबूतों का आधार बने।

पुलिस ने धनंजय की तलाश शुरू की। उसका कोई सुराग नहीं मिल रहा था। आखिरकार, 12 मई 1990 को, उसे उसके गाँव कुलुडीहि से गिरफ्तार किया गया। उसके पास से एक कलाई घड़ी मिली, जो हेतल के घर से चोरी हुई थी। उसकी शर्ट से एक क्रीम रंग का बटन भी बरामद हुआ, जो क्राइम सीन पर मिले बटन से मेल खाता था। लेकिन एक कमी थी—कोई प्रत्यक्ष गवाह नहीं था।


कोर्ट में सुनवाई: सजा का रास्ता

धनंजय पर तीन आरोप लगे—बलात्कार (IPC धारा 376), हत्या (IPC धारा 302), और चोरी (IPC धारा 380)। मुकदमा अलीपुर की अतिरिक्त सत्र अदालत में चला। अभियोजन पक्ष का नेतृत्व सरकारी वकील अशोक चक्रवर्ती ने किया। उनका दावा था कि धनंजय ने हेतल को पहले से परेशान किया था। उसने उसे छेड़ा था और एक बार सिनेमा साथ चलने को कहा था, जिसे हेतल ने ठुकरा दिया। 5 मार्च को उसने मौका पाकर अपराध को अंजाम दिया।

सबूतों में शामिल था:

  • क्रीम रंग का बटन: हेतल के कमरे से मिला, जो धनंजय की शर्ट से मेल खाता था।
  • चोरी हुई घड़ी: उसके पास से बरामद।
  • गवाहों के बयान: जो उसे अपार्टमेंट में देखने की बात कह रहे थे।
  • पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट: बलात्कार और गला घोंटने की पुष्टि।

धनंजय ने खुद को बेकसूर बताया। उसका कहना था कि वो उस दिन अपने भाई के एक समारोह के लिए गाँव गया था। उसने कहा कि पुलिस ने उसे फँसाया। लेकिन कोर्ट ने उसके दावे को खारिज कर दिया। गवाहों ने उसके गाँव जाने की बात को झूठा साबित किया। 12 अगस्त 1991 को सत्र अदालत ने उसे दोषी ठहराया और फाँसी की सजा सुनाई।

धनंजय ने अपील की। 1992 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने सजा को बरकरार रखा। फिर 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसला सुनाया। जस्टिस एम.एम. पुंछी की बेंच ने इसे "रेयरेस्ट ऑफ रेयर" केस माना। कोर्ट का तर्क था कि धनंजय एक सिक्योरिटी गार्ड था—उसका काम हेतल की रक्षा करना था, न कि उसकी जिंदगी छीनना।


फाँसी का इंतज़ार: 14 साल का संघर्ष

सजा सुनने के बाद धनंजय को अलीपुर जेल में रखा गया। उसकी फाँसी की तारीख कई बार टली। उसकी पत्नी पूर्णिमा और परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की। वकील सुब्रतो रॉय ने तर्क दिया कि सबूत कमजोर थे—कोई डीएनए टेस्ट नहीं हुआ, और खून के नमूने धनंजय से मेल नहीं खाते थे। लेकिन कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

2004 में मामला राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के पास पहुँचा। पूर्णिमा ने दया की गुहार लगाई। लेकिन जनता का दबाव बढ़ता गया। कोलकाता में लोग सड़कों पर उतरे। हस्ताक्षर अभियान चले। उस समय की मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्जी की पत्नी मीरा ने भी फाँसी की माँग की। लोग इसे "न्याय का प्रतीक" मान रहे थे।

आखिरकार, 4 अगस्त 2004 को दया याचिका खारिज हुई। 14 अगस्त 2004 को—अपने 39वें जन्मदिन पर—धनंजय को सुबह 4:30 बजे फाँसी दे दी गई। जल्लाद नट्टा मुल्लिक ने बताया कि उसके आखिरी शब्द थे: "मैं निर्दोष हूँ। वे मुझे मार रहे हैं।" उसकी माँ और पत्नी जेल के बाहर रोते हुए देखी गईं।


फाँसी के बाद का विवाद: सच या झूठ?

धनंजय की फाँसी भारत में फाँसी की सजा पर बहस का मुद्दा बन गई। कई सवाल अनसुलझे रह गए:

  • सबूतों की कमी: कोई डीएनए टेस्ट नहीं हुआ। पोस्टमॉर्टम में बलात्कार की पुष्टि हुई, लेकिन जबरदस्ती के साफ निशान नहीं थे।
  • खून का रहस्य: क्राइम सीन पर मिला खून धनंजय का नहीं था। इसका जवाब कभी नहीं मिला।
  • मकसद: अभियोजन पक्ष ठोस मकसद साबित नहीं कर पाया। क्या ये सिर्फ चोरी थी, या कुछ और?

आईएसआई कोलकाता के प्रोफेसरों ने किताब "आदालत-मीडिया-समाज और धनंजय की फाँसी" में दावा किया कि उसे गलत फँसाया गया। उनका कहना था कि पुलिस और मीडिया के दबाव में उसे बलि का बकरा बनाया गया। मानवाधिकार संगठनों ने भी सवाल उठाए कि क्या फाँसी सही थी।

वहीं, हेतल के परिवार और कोलकाता के लोगों का कहना था कि उसे सजा मिलनी ही चाहिए थी। यशोमति ने एक इंटरव्यू में कहा, "मेरी बेटी को कोई वापस नहीं ला सकता, लेकिन कम से कम उसे इंसाफ तो मिला।"


मीडिया की भूमिका: जनमत का निर्माण

इस केस में मीडिया का बड़ा रोल रहा। बंगाली अखबारों जैसे आनंदबाजार पत्रिका और दैनिक स्टेट्समैन ने इसे हर दिन पहले पन्ने पर छापा। हेतल की तस्वीरें, धनंजय की गिरफ्तारी, और कोर्ट की सुनवाई—सब कुछ लोगों तक पहुँचा। टीवी चैनलों ने इसे सनसनी बना दिया।

लेकिन कई बार मीडिया ने तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा। धनंजय को "शैतान" और "दरिंदा" कहा गया, बिना ये देखे कि सबूत कितने पक्के थे। इससे जनता में गुस्सा भड़का, और फाँसी की माँग तेज़ हुई।


समाज पर असर: एक सबक

धनंजय चटर्जी केस ने कई सवाल छोड़े। इसने अपार्टमेंट में रहने वालों को सिक्योरिटी पर सवाल उठाने को मजबूर किया। माता-पिता अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हुए। स्कूलों में बच्चों को अजनबियों से सावधान रहने की सलाह दी जाने लगी।

कानून के नजरिए से, इसने "रेयरेस्ट ऑफ रेयर" की परिभाषा को मजबूत किया। लेकिन ये भी दिखाया कि परिस्थितिजन्य सबूतों पर कितना भरोसा करना चाहिए।


धनंजय की पत्नी और परिवार: टूटा हुआ जीवन

फाँसी के बाद पूर्णिमा की जिंदगी बिखर गई। वो गाँव में अकेली रहती थी, समाज के तानों के बीच। उसने एक बार कहा, "मैं जानती हूँ मेरा पति ऐसा नहीं कर सकता था। लेकिन कौन मेरी सुनेगा?" धनंजय की माँ की तबीयत खराब हो गई, और वो कुछ साल बाद चल बसीं।


निष्कर्ष: न्याय या अन्याय?

धनंजय चटर्जी केस की पूरी कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है। हेतल को इंसाफ मिला, लेकिन क्या धनंजय के साथ अन्याय हुआ? क्या भारत में फाँसी की सजा हमेशा सही होती है? 1990 के इस अपराध ने हमें सबक दिया कि हर केस की तह तक जाना जरूरी है। कहीं ऐसा न हो कि एक निर्दोष की सजा से सच्चा गुनहगार आज़ाद घूमता रहे।

ये कहानी खत्म नहीं हुई। ये आज भी सवाल पूछती है—न्याय क्या है? और हम इसे कैसे सुनिश्चित करें?

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