परिचय: एक सुबह जो इतिहास बन गई
Burari Deaths:
1 जुलाई 2018 की सुबह दिल्ली के बुराड़ी इलाके में कुछ ऐसा हुआ जिसने न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। सूरज की पहली किरणों के साथ ही एक साधारण-सा दिखने वाला घर खौफनाक सुर्खियों में बदल गया। चुंडावत परिवार के 11 सदस्यों के शव एक साथ मिले—10 लटके हुए और एक ज़मीन पर पड़ा हुआ। यह कोई साधारण अपराध नहीं था, बल्कि एक ऐसा रहस्य था जिसने पुलिस, मनोवैज्ञानिकों और आम लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। क्या यह सामूहिक आत्महत्या थी? क्या इसके पीछे कोई साजिश थी? या फिर अंधविश्वास की ऐसी आंधी थी जिसने एक खुशहाल परिवार को मौत के मुंह में झोंक दिया?
मैं जब इस घटना के बारे में सोचता हूँ, तो मन में एक अजीब-सी बेचैनी उठती है। एक परिवार, जो बाहर से देखने में बिल्कुल आम था—दुकान चलाते थे, हँसते-बोलते थे, बच्चों को स्कूल भेजते थे—वह अचानक ऐसा कदम कैसे उठा सकता है? यह लेख उस भयावह घटना की गहराई में उतरने की कोशिश है। हम चुंडावत परिवार की ज़िंदगी, उनके अंत के कारणों और इस कांड के समाज पर प्रभाव को समझने की कोशिश करेंगे।
चुंडावत परिवार: एक साधारण कहानी का असाधारण अंत
चुंडावत परिवार मूल रूप से राजस्थान का रहने वाला था। हरियाणा के तोहाना में कुछ साल बिताने के बाद वे 1990 के आसपास दिल्ली के बुराड़ी में बस गए। यहाँ उन्होंने सेंट नगर इलाके में एक तीन मंजिला मकान बनाया, जिसमें उनकी ज़िंदगी की नई शुरुआत हुई। परिवार में कुल 11 लोग थे—नारायणी देवी (80 साल), उनकी बेटी प्रतिभा भाटिया (57 साल), बेटे भुवनेश (50 साल) और ललित (45 साल), भुवनेश की पत्नी सविता (48 साल), ललित की पत्नी टीना (42 साल), उनके बच्चे नीतू (25 साल), मनीषा (23 साल), ध्रुव (15 साल), शिवम (15 साल) और प्रतिभा की बेटी प्रियंका (33 साल)।
ये लोग बाहर से एकदम सामान्य नज़र आते थे। भुवनेश और ललित ने मिलकर एक प्लाइवुड की दुकान और किराने का स्टोर चलाया। बच्चे पढ़ाई में अच्छे थे, प्रियंका की तो हाल ही में सगाई हुई थी। पड़ोसियों के मुताबिक, ये परिवार हमेशा मिलनसार और मददगार रहा। लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि ये लोग एक रात में अपनी ज़िंदगी खत्म करने का फैसला कर बैठे?
घटना का दिन: जब पड़ोसियों ने देखा अनहोनी का मंज़र
उस सुबह पड़ोसी गुरचरण सिंह रोज़ की तरह टहलने निकले थे। उन्होंने देखा कि भाटिया परिवार की दुकान नहीं खुली, दूध का पैकेट दरवाज़े पर पड़ा था और फोन भी कोई नहीं उठा रहा था। कुछ गड़बड़ लगी तो वे घर के अंदर गए। दरवाज़ा खुला था। ऊपर पहुँचते ही उनके होश उड़ गए—10 लोग लोहे की जाली से लटक रहे थे। आँखों पर पट्टी, हाथ-पैर बंधे हुए, मुँह पर टेप। पास के कमरे में नारायणी देवी का शव ज़मीन पर पड़ा था, गला घोंटा हुआ। यह दृश्य किसी डरावनी फिल्म से कम नहीं था।
पुलिस को बुलाया गया। हेड कांस्टेबल राजीव तोमर पहले अधिकारी थे जो घटनास्थल पर पहुँचे। बाद में उन्होंने कहा, “मैंने अपने 17 साल के करियर में ऐसा कुछ नहीं देखा। मैं 10-15 सेकंड से ज़्यादा वहाँ नहीं रुक सका।” खबर फैली और देखते ही देखते बुराड़ी का ये घर लोगों की चर्चा का केंद्र बन गया।
जांच की शुरुआत: आत्महत्या या हत्या?
पुलिस के सामने पहला सवाल था—क्या यह हत्या थी? लेकिन जल्द ही सबूतों ने दूसरी कहानी बयाँ की। घर में कोई जबरदस्ती के निशान नहीं थे। दरवाज़े-खिड़कियाँ सही हालत में थे। फिर पुलिस को कुछ डायरीज़ मिलीं, जो ललित और टीना के कमरे से बरामद हुईं। इनमें 11 सालों से लिखे गए नोट्स थे, जो इस घटना की जड़ तक ले गए।
डायरी में लिखा था कि परिवार एक “मोक्ष प्राप्ति” के अनुष्ठान में शामिल था। एक नोट में साफ लिखा था—“सभी को आँखों पर पट्टी बाँधनी है, हाथ-पैर बाँधने हैं, मुँह पर टेप लगाना है। जब बरगद का पेड़ हिलने लगे, तो समझ जाना कि वह (पिता) आ गए हैं। फिर सब ठीक हो जाएगा।” यह “वह” कौन था? पुलिस को शक हुआ कि ये भोपाल सिंह, ललित के पिता थे, जो 2007 में मर चुके थे।
ललित का भ्रम: एक पिता की “वापसी”
ललित इस कहानी का केंद्र था। पड़ोसियों और रिश्तेदारों के मुताबिक, 2007 में पिता भोपाल सिंह की मौत के बाद ललित बदल गया था। भोपाल सिंह की साँस की बीमारी से मौत हुई थी, और परिवार दुख में डूब गया। उसी साल एक दिन, गरुड़ पुराण के पाठ के दौरान ललित ने अचानक “ॐ” का जाप शुरू कर दिया। उसकी आवाज़, जो 2004 में एक हादसे में चली गई थी, वापस आ गई। परिवार ने इसे चमत्कार माना और कहा—“पापा आ गए।”
यहाँ से ललित का व्यवहार बदलने लगा। उसने दावा किया कि पिता की आत्मा उससे बात करती है और उसे निर्देश देती है। डायरी में लिखे नोट्स उसी की लिखावट में थे। उसने परिवार को बताया कि अगर वे इन निर्देशों का पालन करेंगे, तो उन्हें भगवान के दर्शन होंगे और सारी परेशानियाँ खत्म हो जाएँगी। लेकिन क्या पूरा परिवार इस भ्रम में शामिल हो गया?
साझा भ्रम: कैसे एक परिवार ने सब कुछ मान लिया?
मनोवैज्ञानिक इसे “साझा भ्रम” (Shared Psychotic Disorder) कहते हैं। यह एक दुर्लभ स्थिति है, जिसमें एक व्यक्ति का भ्रम बाकी लोगों में फैल जाता है, खासकर अगर वे करीबी हों। ललित इस भ्रम का स्रोत था। उसकी बातों पर परिवार ने इसलिए भरोसा किया क्योंकि वे उससे प्यार करते थे और उस पर निर्भर थे। डायरी में लिखे अनुष्ठानों में हर कदम का ज़िक्र था—कब क्या करना है, कैसे रस्सियाँ बाँधनी हैं, कितने मिनट तक प्रतीक्षा करनी है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी ने इसका विरोध नहीं किया? 15 साल के ध्रुव और शिवम, जो स्कूल जाते थे, क्या उन्हें शक नहीं हुआ? 57 साल की प्रतिभा, जो समझदार थीं, उन्होंने क्यों कुछ नहीं कहा? शायद परिवार का आपसी भरोसा इतना गहरा था कि कोई सवाल उठाने की हिम्मत ही नहीं कर सका। या फिर, ललित का डर इतना था कि सब चुप रहे।
उस रात का सच: अनुष्ठान से मौत तक
30 जून 2018 की रात को परिवार ने आखिरी बार खाना खाया। सीसीटीवी में दिखा कि वे हँसते-मुस्कुराते हुए घर लौटे। रात करीब 1 बजे अनुष्ठान शुरू हुआ। डायरी के मुताबिक, वे मानते थे कि यह एक “आध्यात्मिक क्रिया” है, जिसके बाद वे बच जाएँगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 10 लोगों ने जाली से रस्सियाँ बाँधीं, स्टूल पर चढ़े, और फिर स्टूल हटा दिए गए। नारायणी देवी, जो बूढ़ी थीं, शायद खुद ऐसा नहीं कर सकती थीं, इसलिए उनका गला घोंटा गया।
सुबह जब शव मिले, तो पुलिस ने इसे आत्महत्या करार दिया। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। क्या यह सचमुच आत्महत्या थी, या अनजाने में हुई एक भयानक गलती?
समाज पर प्रभाव: अंधविश्वास की जड़ें
बुराड़ी कांड ने भारत में अंधविश्वास पर बहस छेड़ दी। हम एक तरफ चाँद पर पहुँच रहे हैं, दूसरी तरफ ऐसे मामले सामने आते हैं जो हमें पीछे खींचते हैं। दिल्ली पुलिस ने इस केस को 2018 में ही बंद कर दिया, लेकिन सवाल आज भी बाकी हैं। क्या ललित बीमार था? क्या परिवार को मदद की ज़रूरत थी जो उन्हें नहीं मिली?
पड़ोसियों का कहना है कि घर अब भी खाली पड़ा है। लोग इसे “भूतिया” मानते हैं। बच्चे वहाँ से गुज़रते वक्त डरते हैं। लेकिन असली डर उस सोच में है जो इस हादसे को जन्म देती है।
निष्कर्ष: सबक और सवाल
बुराड़ी कांड एक परिवार की कहानी से कहीं ज़्यादा है। यह हमारे समाज, मानसिक स्वास्थ्य और विश्वास की सीमाओं की कहानी है। अगर ललित को समय पर इलाज मिलता, अगर परिवार ने बाहर से मदद माँगी होती, तो शायद आज 11 लोग ज़िंदा होते। यह घटना हमें सिखाती है कि अंधविश्वास और मानसिक बीमारी को नज़रअंदाज़ करना कितना खतरनाक हो सकता है।
आज जब मैं उस घर की तस्वीरें देखता हूँ, तो सोचता हूँ—काश, कोई एक आवाज़ उठाता। काश, कोई कहता कि यह सही नहीं है। लेकिन अब सिर्फ सन्नाटा है, और अनसुलझे सवालों की गूँज। आप क्या सोचते हैं—क्या यह रोकने लायक था?
.png)