प्रियदर्शिनी मट्टू रेप-मर्डर केस (Priyadarshini Mattoo Rape-Murder) : एक बेटी की चीख और न्याय की लंबी जंग

 परिचय: एक दोपहर जो दर्द बन गई




23 जनवरी 1996 की वह ठंडी दोपहर दिल्ली में कुछ ऐसा हुआ जिसने न सिर्फ एक परिवार को तोड़ दिया, बल्कि देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया। प्रियदर्शिनी मट्टू, एक 25 साल की लॉ स्टूडेंट, अपने ही घर में बेरहमी से बलात्कार और हत्या का शिकार हुई। वह लड़की, जो अपने सपनों को सच करने की राह पर थी, एक दरिंदे की हवस का शिकार बन गई। हत्यारा था संतोष कुमार सिंह—एक ऐसा शख्स जिसका रसूख और अहंकार उसे बचाने की हर कोशिश में जुट गया। “प्रियदर्शिनी मट्टू रेप-मर्डर केस” सिर्फ एक अपराध की कहानी नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी और फिर उसकी जीत का प्रतीक है।

मैं जब इस घटना के बारे में सोचता हूँ, तो मन में एक अजीब-सा गुस्सा और दुख उठता है। एक लड़की, जो अपने माँ-बाप की उम्मीद थी, जिसके पास पूरी ज़िंदगी पड़ी थी, वह चंद मिनटों में सब कुछ खो बैठी। लेकिन इस कहानी का अंत सिर्फ दर्द नहीं—यह एक सबक भी है। यह लेख उस भयावह दिन की सच्चाई, लंबी कानूनी लड़ाई और समाज पर इसके प्रभाव को सामने लाने की कोशिश है।

प्रियदर्शिनी: एक सपनों भरी ज़िंदगी


प्रियदर्शिनी मट्टू का जन्म 1970 में जम्मू-कश्मीर में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनके पिता चमन लाल मट्टू भारतीय डाक सेवा में बड़े अधिकारी थे। 1990 के दशक में कश्मीर में हालात बिगड़ने के बाद परिवार दिल्ली आ गया। प्रियदर्शिनी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के लॉ सेंटर में दाखिला लिया। वह पढ़ाई में तेज़ थी, दोस्तों में लोकप्रिय थी, और एक वकील बनने का सपना देखती थी। उसकी मुस्कान और सादगी सबको भाती थी। लेकिन उसकी ज़िंदगी में एक साया था—संतोष कुमार सिंह।


संतोष वही कॉलेज में उसका सीनियर था। वह प्रियदर्शिनी से एकतरफा प्यार करता था और उसे परेशान करता था। प्रियदर्शिनी ने उसकी हरकतों से तंग आकर कई बार शिकायत की—कॉलेज में, पुलिस में। उसने संतोष के खिलाफ गैर-जमानती वारंट तक जारी करवाया था। लेकिन यह सब उस दरिंदे को रोक नहीं सका।


वह काला दिन: हत्या की दास्ताँ


23 जनवरी 1996 को प्रियदर्शिनी अपने वसंत कुंज स्थित घर में अकेली थी। दोपहर करीब 12 बजे संतोष वहाँ पहुँचा। पड़ोसियों ने उसे देखा था, लेकिन किसी को शक नहीं हुआ। दरवाज़ा खुला था—शायद प्रियदर्शिनी को लगा कि कोई परिचित है। लेकिन जो हुआ, वह किसी के बुरे सपने से भी ज़्यादा खौफनाक था। संतोष ने पहले प्रियदर्शिनी का बलात्कार किया। फिर, जब उसने विरोध किया, तो उसने इलेक्ट्रिक वायर से उसका गला घोंट दिया। ऑटोप्सी में पता चला कि उसके चेहरे पर हेलमेट से 19 बार वार किए गए थे। यह सिर्फ हत्या नहीं, बल्कि क्रूरता की हद थी।


जब चमन लाल मट्टू शाम को घर लौटे, तो उनकी बेटी खून से लथपथ ज़मीन पर पड़ी थी। वह चीखे, रोए, लेकिन प्रियदर्शिनी की साँसें हमेशा के लिए थम चुकी थीं। यह एक ऐसी घटना थी जिसने “महिला सुरक्षा” पर सवाल उठा दिए।


हत्यारा: संतोष कुमार सिंह की सच्चाई


संतोष कुमार सिंह एक आईपीएस अधिकारी का बेटा था। उसके पिता जीपी सिंह दिल्ली पुलिस में बड़े पद पर थे। संतोष खुद लॉ की पढ़ाई कर रहा था, लेकिन उसका व्यवहार हमेशा से परेशान करने वाला था। प्रियदर्शिनी से पहले भी उसने उसे स्टॉक किया, धमकियाँ दीं, और उसका पीछा किया। पुलिस को उसकी हरकतों की जानकारी थी, फिर भी उसे रोकने में नाकाम रही। हत्या के बाद संतोष फरार हो गया, लेकिन जल्द ही गिरफ्तार कर लिया गया। यहाँ से शुरू हुई “न्याय की लड़ाई”।


पहला झटका: निचली अदालत का फैसला


1999 में दिल्ली की निचली अदालत में सुनवाई पूरी हुई। सबूत साफ थे—संतोष के कपड़ों पर प्रियदर्शिनी का खून, उसकी हेलमेट पर डीएनए, और पड़ोसियों के बयान। लेकिन कोर्ट ने उसे बरी कर दिया। जज ने कहा कि “सबूत पुख्ता नहीं हैं।” यहाँ तक कि संतोष के पिता के प्रभाव का ज़िक्र भी हुआ। चमन लाल मट्टू ने कहा, “मेरी बेटी को मारने वाला खुला घूम रहा है, और सिस्टम चुप है।” यह फैसला एक मिसाल बन गया—यह दिखाने के लिए कि रसूख के आगे सच कितना कमज़ोर पड़ सकता है।


जनता और मीडिया की ताकत


निचली अदालत के फैसले ने लोगों में गुस्सा भर दिया। अखबारों ने लिखा—“प्रियदर्शिनी को न्याय कब मिलेगा?” टीवी चैनलों ने बहस छेड़ी। यह वह दौर था जब “जेसिका लाल मर्डर केस” की तरह ही जनता सड़कों पर उतरने लगी थी। प्रियदर्शिनी के दोस्तों और परिवार ने प्रदर्शन किए। एनजीओ और महिला संगठनों ने आवाज़ उठाई। मुझे याद है, उस वक्त मैं स्कूल में था, और टीचर ने क्लास में इस केस पर चर्चा की थी। हम बच्चों ने भी सोचा—क्या सचमुच सिस्टम इतना लाचार है?


दिल्ली हाई कोर्ट की सुनवाई: उम्मीद की किरण


2006 में “दिल्ली हाई कोर्ट” ने इस मामले को दोबारा खोला। जस्टिस आरएस सोढ़ी और जस्टिस पीके भसीन की बेंच ने सबूतों को नए सिरे से देखा। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत का फैसला “न्याय का मज़ाक” था। सबूतों को फिर से परखा गया—डीएनए, खून के निशान, और गवाहों के बयान। 30 अक्टूबर 2006 को संतोष कुमार सिंह को दोषी ठहराया गया और उसे मौत की सजा सुनाई गई। कोर्ट ने कहा, “यह अपराध समाज के खिलाफ है, और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।”


सुप्रीम कोर्ट का फैसला: सजा में बदलाव


संतोष ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। 2010 में जस्टिस पी सथाशिवम और जस्टिस स्वतंत्र कुमार की बेंच ने उसकी सजा को उम्रकैद में बदल दिया। कोर्ट ने कहा कि यह “रेयर ऑफ रेयरेस्ट” मामला नहीं है, जिसमें फाँसी दी जाए। चमन लाल मट्टू ने इसे स्वीकार किया, लेकिन कहा, “मेरी बेटी को पूरा न्याय नहीं मिला।” संतोष आज भी जेल में है, लेकिन यह सवाल बाकी है—क्या सजा ही काफी थी?


समाज पर असर: एक जागरूकता की शुरुआत


“प्रियदर्शिनी मट्टू रेप-मर्डर केस” ने भारत में कई सवाल खड़े किए। “महिला सुरक्षा” पर बहस तेज़ हुई। यह केस उन पहले मामलों में से था जिसने बलात्कार और हत्या के लिए तेज़ न्याय की माँग को हवा दी। कानून में बदलाव की बात हुई—फास्ट-ट्रैक कोर्ट की ज़रूरत पड़ी। यहाँ तक कि पुलिस सुधारों पर भी सवाल उठे। अगर संतोष को पहले रोका जाता, तो शायद प्रियदर्शिनी आज ज़िंदा होती।


इस केस ने युवाओं को भी झकझोरा। मेरे जैसे कई लोगों ने इसे एक सबक की तरह देखा—कि हमें अपने आसपास की महिलाओं की सुरक्षा के लिए सजग रहना होगा। यह सिर्फ एक लड़की की कहानी नहीं थी—यह हर उस बेटी की कहानी थी जो अपने सपने पूरे करना चाहती है।


संतोष की सजा: क्या यह खत्म हुई कहानी?


संतोष को उम्रकैद हुई, लेकिन क्या वह आज भी जेल में है? 2020 में कोविड के दौरान कई कैदियों को पैरोल मिली, और संतोष का नाम भी चर्चा में आया। हालांकि, उसकी रिहाई की कोई पक्की खबर नहीं आई। लेकिन हर बार जब उसका नाम सुर्खियों में आता है, प्रियदर्शिनी के चाहने वालों का दर्द ताज़ा हो जाता है।


निजी नज़रिया: एक दर्द जो भूलता नहीं


मैं जब प्रियदर्शिनी की तस्वीरें देखता हूँ—उसकी हँसी, उसकी आँखों में सपने—तो सोचता हूँ कि वह मेरी बहन या दोस्त हो सकती थी। यह केस मुझे सिखाता है कि अन्याय के खिलाफ बोलना कितना ज़रूरी है। अगर हम चुप रहे, तो ऐसे “संतोष कुमार सिंह” हर बार बचते रहेंगे। यह एक चेतावनी है—हमारे सिस्टम को, हमारे समाज को, और हम सबको।


निष्कर्ष: सवाल और सबक


प्रियदर्शिनी मट्टू को न्याय मिला, लेकिन देर से। यह “न्याय की लड़ाई” एक मिसाल बन गई, लेकिन यह भी दिखाती है कि सिस्टम में कितनी खामियाँ हैं। आज जब हम इस केस को याद करते हैं, तो यह पूछना ज़रूरी है—क्या हमने सचमुच कुछ सीखा? क्या हमारी बेटियाँ अब सुरक्षित हैं? आप क्या सोचते हैं—क्या प्रियदर्शिनी की चीख हमें बदलने के लिए काफी थी, या यह सिर्फ एक और भूली हुई कहानी बनकर रह गई?



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